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सफेद, गुलाबी, लाल या पीली... दवाइयों के अलग-अलग रंगों का क्या है राज़?


 

💊 सफेद, गुलाबी, लाल या पीली... दवाइयां क्यों होती हैं अलग-अलग रंगों में? जानिए इसके पीछे का साइंस और मनोविज्ञान

चाहे कोई बीमारी हो या फिर कोई मल्टीविटामिन सप्लीमेंट — गोलियां अब हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ दवाएं हरी होती हैं, कुछ नीली, और कुछ सिर्फ सफेद ही क्यों? क्या इन रंगों का कोई मतलब होता है या ये सिर्फ मार्केटिंग का खेल है?
चलिए, आज जानते हैं दवाओं की इस रंगीन दुनिया के पीछे छिपे सच को।


🧠 हर रंग का मतलब होता है — सिर्फ दिखावे के लिए नहीं

असल में, दवाओं के हर रंग के पीछे एक खास कारण होता है। ये सिर्फ सुंदर दिखने के लिए नहीं बनाए जाते, बल्कि आपकी सेहत, सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखकर तय किए जाते हैं।
भारत जैसे देश में, जहां हर घर में कोई न कोई दवा ज़रूर चलती है — चाहे वो ब्लड प्रेशर की गोली हो या विटामिन की टैबलेट — इन रंगों का मकसद है आपको गलती करने से बचाना।


🎯 पहचान का जादू: गलत दवा खाने से बचाती है रंगीन गोली

दवाओं के रंग पहचान में मदद करते हैं। अगर आप कई दवाएं एक साथ ले रहे हैं — सुबह की, दोपहर की, रात की — और सभी एक जैसी दिखें, तो गड़बड़ी होना तय है।
इसलिए फार्मा कंपनियां अलग-अलग रंगों का इस्तेमाल करती हैं ताकि मरीज और फार्मासिस्ट दोनों आसानी से पहचान सकें।
एक स्टडी के मुताबिक, रंगीन गोलियां दवा की गलतियों को 30% तक कम कर सकती हैं!
ग्रामीण या कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए ये और भी मददगार साबित होती हैं — उन्हें याद रहता है, “हरी वाली सुबह, लाल वाली रात!”


🎨 रंगों का मनोवैज्ञानिक खेल: दिमाग पर भी पड़ता है असर

रंग केवल पहचान के लिए नहीं होते, ये हमारे मूड और दिमाग को भी प्रभावित करते हैं।

  • लाल, पीली या नारंगी गोलियां हमें ऊर्जा या ताजगी का एहसास दिलाती हैं — जैसे कॉफी पीने के बाद जो जोश आता है।

  • नीली या हरी गोलियां शांति और सुकून से जुड़ी मानी जाती हैं, इसलिए इन्हें अक्सर स्लीपिंग पिल्स या एंटी-एंग्ज़ाइटी मेडिसिन में इस्तेमाल किया जाता है।

  • सफेद रंग साफ-सुथरा और भरोसेमंद माना जाता है — इसलिए ये पेनकिलर्स या सामान्य दवाओं में आम है।

हमारे अवचेतन मन में बचपन से रंगों के अर्थ बस जाते हैं — लाल मतलब तेज असर, नीला मतलब शांति। इसीलिए ये रंग हमारी सोच और उम्मीदों को subtly influence करते हैं।


💼 मार्केटिंग का रंगीन खेल: जब रंग बेचता है ब्रांड

कुछ रंगों का चुनाव पूरी तरह मार्केटिंग स्ट्रैटेजी पर आधारित होता है।
जैसे — वियाग्रा नीली क्यों है? क्योंकि नीला रंग विश्वास, स्थिरता और ताकत का प्रतीक है।
भारत में भी कई कंपनियां दवाओं के रंगों से ब्रांड आइडेंटिटी बनाती हैं — पेनकिलर की लाल गोली, विटामिन C की नारंगी टैबलेट... ये सब “खास दवा” का एहसास देते हैं।

हालांकि, कई बार इस्तेमाल किए गए रंग आर्टिफिशियल डाई (FD&C colors) होते हैं। ये सामान्यतः सुरक्षित हैं, लेकिन कुछ लोगों में एलर्जी का कारण बन सकते हैं — इसलिए डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें।


🇮🇳 भारत में रंगीन गोलियों का सफर: भरोसा और सावधानी दोनों ज़रूरी

भारत का फार्मा बाज़ार दुनिया में तीसरे नंबर पर है, और यहां रंगीन गोलियां अब आम हो चुकी हैं।
कोविड के दौर में नीली और हरी दवाएं लोगों के लिए पहचान और भरोसे का प्रतीक बन गईं।
लेकिन चुनौतियां भी हैं — खासकर ग्रामीण इलाकों में, जहां लोग रंग के आधार पर दवा पहचानते हैं, वहां नकली दवाओं का खतरा भी बढ़ जाता है।

इसलिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं —

“सिर्फ रंग पर भरोसा न करें। पैकेजिंग, ब्रांड लोगो और बैच नंबर जरूर चेक करें।”

रंग दवा के असर को नहीं बदलते, लेकिन ये हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को आसान और सुरक्षित ज़रूर बनाते हैं।


🌈 निष्कर्ष: दवाओं की रंगीन दुनिया सिर्फ खूबसूरती नहीं, समझदारी भी है

हर रंग के पीछे छिपी है एक सोच — चाहे वह पहचान की हो, मनोविज्ञान की हो या ब्रांडिंग की।
तो अगली बार जब आप कोई गोली लें, तो उसके रंग को बस नजरअंदाज़ मत करें — वह आपकी सुरक्षा, याददाश्त और भरोसे का हिस्सा है।

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