राजुला–मालूसाई : उत्तराखंड का अमर लोकप्रेम
उत्तराखंड की धरती पर अनेक प्रेम कथाएँ लोकगीतों, जागरों और लोकनृत्यों में आज भी जीवित हैं। इन्हीं में से एक है—राजुला और मालूसाई की कथा। यह कहानी सिर्फ दो प्रेमियों की नहीं, बल्कि साहस, संघर्ष और सच्चे प्रेम की शक्ति की मिसाल है।
कहानी की शुरुआत
कुमाऊँ की पर्वतीय घाटियों में एक गाँव में मालूसाई नाम का युवा रहता था। वह गरीब घर का था, पर मेहनती, ईमानदार और साहसी था। उसका स्वभाव शांत और विनम्र था। उसी क्षेत्र के राजा की पुत्री थी राजुला—सुंदर, चतुर और दयालु।
कहते हैं कि एक बड़े मेले में पहली बार राजुला और मालूसाई की नज़रें मिलीं। दोनों एक-दूसरे की सादगी और आकर्षण से प्रभावित हुए। धीरे-धीरे यह आकर्षण प्रेम में बदल गया। दोनों छुप–छुपकर मिलते, बातें करते और भविष्य के सपने देखते।
राजदरबार का विरोध
जब यह बात राजुला के परिवार और दरबारियों को पता चली, तो वे क्रोधित हो उठे।
उनका मानना था कि राजकुमारी का विवाह किसी बड़े राजघराने में ही होना चाहिए, न कि किसी गरीब युवक से।
राजा ने मालूसाई को बुलाया।
उसने धमकाकर कहा—
“राजुला से दूर रहो, वरना परिणाम बुरे होंगे।”
पर मालूसाई ने प्रेम छोड़ने से इनकार कर दिया।
यह बात राजा के अहंकार को ठेस पहुँचा गई। दरबारियों की सलाह पर राजा ने मालूसाई को ऐसे–ऐसे कामों पर भेजना शुरू किया जिनसे उसकी मृत्यु निश्चित मानी जाती थी।
साहस की परीक्षाएँ
राजा ने उसे खतरनाक जंगलों में भेजा, जहाँ जंगली जानवरों और डाकुओं का डर था।
कभी उसे दुर्गम पहाड़ों में कठिन काम दिए जाते।
कभी ऐसी जगहें जहाँ जीवित बचना आसान नहीं था।
पर मालूसाई ने हर बार अपने हौसले और बुद्धि से हर चुनौती पर विजय पाई।
उसका प्रेम उसे शक्ति देता था।
वहीं दूसरी ओर राजुला अपने कमरे की खिड़की से आकाश की ओर देखकर मालूसाई की रक्षा की दुआ करती रहती।
दरबारियों की साज़िश
दरबार के कुछ लोग मालूसाई से ईर्ष्या रखते थे।
उन्हें लगता था कि यदि वह इन परीक्षाओं से बचता रहा तो एक दिन राजा उसे स्वीकार कर लेगा।
इसलिए उन्होंने एक खतरनाक जाल बिछाया।
एक रात, जब मालूसाई पहाड़ों की ओर जा रहा था, उसे धोखे से एक खतरनाक मार्ग पर भेज दिया गया।
कहते हैं कि वहाँ खाई में गिरकर उसकी मृत्यु हो गई।
राजुला का दर्द और विद्रोह
जब यह खबर राजुला तक पहुँची तो उसकी दुनिया ही उजड़ गई।
उसने खाने–पीने से मना कर दिया, किसी से बात नहीं की।
उसकी आँखों में आँसू और दिल में दर्द के सिवाय कुछ न था।
कहा जाता है कि राजुला ने विद्रोह कर दरबार को चुनौती दी—
“यदि मेरे प्रेम को मौत मिली है, तो मैं भी उसी मार्ग पर जाऊँगी!”
राजपरिवार घबरा गया, पर राजुला का निर्णय अटल था।
अंतिम मिलन (लोककथा का भावपूर्ण मोड़)
कुछ लोककथाओं में कहा जाता है कि राजुला मालूसाई के शव के पास पहुँची और वहीं प्राण त्याग दिए।
दोनों प्रेमी एक ही चिता में सदा के लिए मिल गए।
कहीं-कहीं कथा का दूसरा अंत मिलता है—
कि मालूसाई की मृत्यु की खबर झूठी थी, और लंबे संघर्षों के बाद दोनों प्रेमियों का मिलन हुआ तथा राजा ने विवाह की अनुमति दी।
पर असल संदेश दोनों संस्करणों में एक ही है—
सच्चा प्रेम बाधाओं को पार कर अमर हो जाता है।
आज की पहचान
राजुला–मालूसाई की यह कथा उत्तराखंड के लोकगीतों, ‘मंगल’ और ‘जागर’ में गाई जाती है।
यह पहाड़ों में अमर प्रेम, साहस और त्याग का प्रतीक है।
लोग कहते हैं—
“जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ पर्वत भी झुक जाते हैं।”
0 Comments